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Hindi Sahitya dissertation topics — PG (M.A. / M.Sc. / M.Com.)

120 topics for Hindi Sahitya students of Pandit Deendayal Upadhyay Shekhawati University (PDUSU), Sikar. Each names its own study area, and each can be written in Hindi or English. Choose one to read a free sample; the complete dissertation is ₹799 and arrives as an editable Word file with your name, college and university on it.

आधुनिक कविता और छायावाद

  1. आधुनिक हिंदी नाटकों में नारी स्वतंत्रता और रंगमंच की भूमिका
  2. आधुनिक हिंदी नाटकों में प्रकृति चित्रण और रंगमंच की भूमिका
  3. आधुनिक हिंदी नाटकों में राष्ट्रीय चेतना और रंगमंच की भूमिका
  4. जयशंकर प्रसाद के उपन्यासों में चित्रित आधुनिकता बोध का समाजशास्त्रीय अध्ययन
  5. तुलसीदास के काव्य में मानवीय संवेदना का स्वरूप और उसकी प्रासंगिकता
  6. दलित आत्मकथाओं में अभिव्यक्त अस्मिता की खोज और सामाजिक यथार्थ
  7. दलित आत्मकथाओं में अभिव्यक्त विस्थापन और त्रास और सामाजिक यथार्थ
  8. दलित आत्मकथाओं में अभिव्यक्त सांस्कृतिक ह्रास और पुनरुत्थान और सामाजिक यथार्थ
  9. धर्मवीर भारती के उपन्यासों में चित्रित नारी स्वतंत्रता का समाजशास्त्रीय अध्ययन
  10. प्रेमचंदोत्तर हिंदी कहानी में अस्मिता की खोज और उसका यथार्थवादी चित्रण
  11. प्रेमचंदोत्तर हिंदी कहानी में राष्ट्रीय चेतना और उसका यथार्थवादी चित्रण
  12. प्रेमचंदोत्तर हिंदी कहानी में वर्ग संघर्ष और उसका यथार्थवादी चित्रण
  13. प्रेमचंदोत्तर हिंदी कहानी में विस्थापन और त्रास और उसका यथार्थवादी चित्रण
  14. फणीश्वर नाथ 'रेणु' के काव्य में अस्मिता की खोज का स्वरूप और उसकी प्रासंगिकता
  15. भक्तिकाल के साहित्य में आधुनिकता बोध और मानवीय मूल्य
  16. भक्तिकाल के साहित्य में विस्थापन और त्रास और मानवीय मूल्य
  17. भक्तिकाल के साहित्य में सांस्कृतिक ह्रास और पुनरुत्थान और मानवीय मूल्य
  18. भीष्म साहनी के काव्य में मानवीय संवेदना का स्वरूप और उसकी प्रासंगिकता
  19. मन्नू भंडारी के उपन्यासों में चित्रित आधुनिकता बोध का समाजशास्त्रीय अध्ययन
  20. मोहन राकेश के काव्य में आधुनिकता बोध का स्वरूप और उसकी प्रासंगिकता
  21. राजस्थानी लोक साहित्य और ढूंढाड़ क्षेत्र की लोकगाथाओं का तुलनात्मक अध्ययन
  22. राजस्थानी लोक साहित्य और मारवाड़ क्षेत्र की लोकगाथाओं का तुलनात्मक अध्ययन
  23. राजस्थानी लोक साहित्य और हाड़ौती क्षेत्र की लोकगाथाओं का तुलनात्मक अध्ययन
  24. समकालीन हिंदी कविता में नारी स्वतंत्रता और प्रतिरोध के स्वर
  25. समकालीन हिंदी कविता में यथार्थवाद और प्रतिरोध के स्वर
  26. समकालीन हिंदी कविता में वर्ग संघर्ष और प्रतिरोध के स्वर
  27. समकालीन हिंदी कविता में सांस्कृतिक ह्रास और पुनरुत्थान और प्रतिरोध के स्वर
  28. स्त्री विमर्श के परिप्रेक्ष्य में कृष्णा सोबती की रचनाओं का आलोचनात्मक मूल्यांकन
  29. स्त्री विमर्श के परिप्रेक्ष्य में जयशंकर प्रसाद की रचनाओं का आलोचनात्मक मूल्यांकन
  30. स्त्री विमर्श के परिप्रेक्ष्य में मोहन राकेश की रचनाओं का आलोचनात्मक मूल्यांकन
  31. हिंदी पत्रकारिता में प्रकृति चित्रण और भाषा की बदलती प्रवृत्ति
  32. हिंदी पत्रकारिता में राष्ट्रीय चेतना और भाषा की बदलती प्रवृत्ति

कथा साहित्य (उपन्यास एवं कहानी)

  1. आधुनिक हिंदी नाटकों में यथार्थवाद और रंगमंच की भूमिका
  2. आधुनिक हिंदी नाटकों में विस्थापन और त्रास और रंगमंच की भूमिका
  3. दलित आत्मकथाओं में अभिव्यक्त नारी स्वतंत्रता और सामाजिक यथार्थ
  4. दलित आत्मकथाओं में अभिव्यक्त प्रकृति चित्रण और सामाजिक यथार्थ
  5. दलित आत्मकथाओं में अभिव्यक्त मानवीय संवेदना और सामाजिक यथार्थ
  6. दलित आत्मकथाओं में अभिव्यक्त राष्ट्रीय चेतना और सामाजिक यथार्थ
  7. धर्मवीर भारती के उपन्यासों में चित्रित यथार्थवाद का समाजशास्त्रीय अध्ययन
  8. धर्मवीर भारती के काव्य में विस्थापन और त्रास का स्वरूप और उसकी प्रासंगिकता
  9. नागार्जुन के काव्य में वर्ग संघर्ष का स्वरूप और उसकी प्रासंगिकता
  10. प्रेमचंदोत्तर हिंदी कहानी में यथार्थवाद और उसका यथार्थवादी चित्रण
  11. भक्तिकाल के साहित्य में अस्मिता की खोज और मानवीय मूल्य
  12. भक्तिकाल के साहित्य में नारी स्वतंत्रता और मानवीय मूल्य
  13. भक्तिकाल के साहित्य में मानवीय संवेदना और मानवीय मूल्य
  14. महादेवी वर्मा के उपन्यासों में चित्रित वर्ग संघर्ष का समाजशास्त्रीय अध्ययन
  15. महादेवी वर्मा के उपन्यासों में चित्रित सांस्कृतिक ह्रास और पुनरुत्थान का समाजशास्त्रीय अध्ययन
  16. मुंशी प्रेमचंद के उपन्यासों में चित्रित अस्मिता की खोज का समाजशास्त्रीय अध्ययन
  17. मुंशी प्रेमचंद के काव्य में यथार्थवाद का स्वरूप और उसकी प्रासंगिकता
  18. मोहन राकेश के काव्य में मानवीय संवेदना का स्वरूप और उसकी प्रासंगिकता
  19. राजस्थानी लोक साहित्य और मेवाड़ क्षेत्र की लोकगाथाओं का तुलनात्मक अध्ययन
  20. राजस्थानी लोक साहित्य और शेखावाटी क्षेत्र की लोकगाथाओं का तुलनात्मक अध्ययन
  21. समकालीन हिंदी कविता में प्रकृति चित्रण और प्रतिरोध के स्वर
  22. समकालीन हिंदी कविता में मानवीय संवेदना और प्रतिरोध के स्वर
  23. स्त्री विमर्श के परिप्रेक्ष्य में भर्तहरि की रचनाओं का आलोचनात्मक मूल्यांकन
  24. स्त्री विमर्श के परिप्रेक्ष्य में भीष्म साहनी की रचनाओं का आलोचनात्मक मूल्यांकन
  25. हिंदी पत्रकारिता में अस्मिता की खोज और भाषा की बदलती प्रवृत्ति
  26. हिंदी पत्रकारिता में सांस्कृतिक ह्रास और पुनरुत्थान और भाषा की बदलती प्रवृत्ति

दलित, स्त्री एवं आदिवासी विमर्श

  1. दलित आत्मकथाओं में अभिव्यक्त आधुनिकता बोध और सामाजिक यथार्थ
  2. धर्मवीर भारती के काव्य में मानवीय संवेदना का स्वरूप और उसकी प्रासंगिकता
  3. भीष्म साहनी के उपन्यासों में चित्रित यथार्थवाद का समाजशास्त्रीय अध्ययन
  4. भीष्म साहनी के उपन्यासों में चित्रित सांस्कृतिक ह्रास और पुनरुत्थान का समाजशास्त्रीय अध्ययन
  5. मोहन राकेश के उपन्यासों में चित्रित आधुनिकता बोध का समाजशास्त्रीय अध्ययन
  6. सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' के काव्य में मानवीय संवेदना का स्वरूप और उसकी प्रासंगिकता
  7. सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' के काव्य में विस्थापन और त्रास का स्वरूप और उसकी प्रासंगिकता
  8. स्त्री विमर्श के परिप्रेक्ष्य में कबीर की रचनाओं का आलोचनात्मक मूल्यांकन
  9. स्त्री विमर्श के परिप्रेक्ष्य में तुलसीदास की रचनाओं का आलोचनात्मक मूल्यांकन
  10. स्त्री विमर्श के परिप्रेक्ष्य में महादेवी वर्मा की रचनाओं का आलोचनात्मक मूल्यांकन

नाटक और रंगमंच

  1. आधुनिक हिंदी नाटकों में सांस्कृतिक ह्रास और पुनरुत्थान और रंगमंच की भूमिका
  2. कबीर के काव्य में अस्मिता की खोज का स्वरूप और उसकी प्रासंगिकता
  3. धर्मवीर भारती के उपन्यासों में चित्रित राष्ट्रीय चेतना का समाजशास्त्रीय अध्ययन
  4. नागार्जुन के उपन्यासों में चित्रित आधुनिकता बोध का समाजशास्त्रीय अध्ययन
  5. नागार्जुन के उपन्यासों में चित्रित सांस्कृतिक ह्रास और पुनरुत्थान का समाजशास्त्रीय अध्ययन
  6. प्रेमचंदोत्तर हिंदी कहानी में नारी स्वतंत्रता और उसका यथार्थवादी चित्रण
  7. प्रेमचंदोत्तर हिंदी कहानी में प्रकृति चित्रण और उसका यथार्थवादी चित्रण
  8. प्रेमचंदोत्तर हिंदी कहानी में मानवीय संवेदना और उसका यथार्थवादी चित्रण
  9. फणीश्वर नाथ 'रेणु' के काव्य में सांस्कृतिक ह्रास और पुनरुत्थान का स्वरूप और उसकी प्रासंगिकता
  10. भक्तिकाल के साहित्य में राष्ट्रीय चेतना और मानवीय मूल्य
  11. भक्तिकाल के साहित्य में वर्ग संघर्ष और मानवीय मूल्य
  12. मन्नू भंडारी के काव्य में वर्ग संघर्ष का स्वरूप और उसकी प्रासंगिकता
  13. समकालीन हिंदी कविता में राष्ट्रीय चेतना और प्रतिरोध के स्वर
  14. सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' के उपन्यासों में चित्रित अस्मिता की खोज का समाजशास्त्रीय अध्ययन
  15. स्त्री विमर्श के परिप्रेक्ष्य में नागार्जुन की रचनाओं का आलोचनात्मक मूल्यांकन
  16. स्त्री विमर्श के परिप्रेक्ष्य में मन्नू भंडारी की रचनाओं का आलोचनात्मक मूल्यांकन
  17. स्त्री विमर्श के परिप्रेक्ष्य में मुंशी प्रेमचंद की रचनाओं का आलोचनात्मक मूल्यांकन
  18. स्त्री विमर्श के परिप्रेक्ष्य में सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' की रचनाओं का आलोचनात्मक मूल्यांकन
  19. हिंदी पत्रकारिता में नारी स्वतंत्रता और भाषा की बदलती प्रवृत्ति
  20. हिंदी पत्रकारिता में मानवीय संवेदना और भाषा की बदलती प्रवृत्ति

पत्रकारिता, अनुवाद और जनसंचार

  1. कृष्णा सोबती के काव्य में अस्मिता की खोज का स्वरूप और उसकी प्रासंगिकता
  2. नागार्जुन के उपन्यासों में चित्रित अस्मिता की खोज का समाजशास्त्रीय अध्ययन
  3. फणीश्वर नाथ 'रेणु' के उपन्यासों में चित्रित विस्थापन और त्रास का समाजशास्त्रीय अध्ययन
  4. भर्तहरि के उपन्यासों में चित्रित राष्ट्रीय चेतना का समाजशास्त्रीय अध्ययन
  5. भर्तहरि के काव्य में सांस्कृतिक ह्रास और पुनरुत्थान का स्वरूप और उसकी प्रासंगिकता
  6. भीष्म साहनी के काव्य में विस्थापन और त्रास का स्वरूप और उसकी प्रासंगिकता
  7. समकालीन हिंदी कविता में विस्थापन और त्रास और प्रतिरोध के स्वर
  8. सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' के काव्य में राष्ट्रीय चेतना का स्वरूप और उसकी प्रासंगिकता

भक्तिकाल और रीतिकाल

  1. अज्ञेय के उपन्यासों में चित्रित विस्थापन और त्रास का समाजशास्त्रीय अध्ययन
  2. आधुनिक हिंदी नाटकों में अस्मिता की खोज और रंगमंच की भूमिका
  3. आधुनिक हिंदी नाटकों में आधुनिकता बोध और रंगमंच की भूमिका
  4. कृष्णा सोबती के उपन्यासों में चित्रित आधुनिकता बोध का समाजशास्त्रीय अध्ययन
  5. जयशंकर प्रसाद के काव्य में आधुनिकता बोध का स्वरूप और उसकी प्रासंगिकता
  6. दलित आत्मकथाओं में अभिव्यक्त वर्ग संघर्ष और सामाजिक यथार्थ
  7. धर्मवीर भारती के काव्य में सांस्कृतिक ह्रास और पुनरुत्थान का स्वरूप और उसकी प्रासंगिकता
  8. फणीश्वर नाथ 'रेणु' के उपन्यासों में चित्रित नारी स्वतंत्रता का समाजशास्त्रीय अध्ययन
  9. भक्तिकाल के साहित्य में यथार्थवाद और मानवीय मूल्य
  10. मुंशी प्रेमचंद के काव्य में प्रकृति चित्रण का स्वरूप और उसकी प्रासंगिकता
  11. समकालीन हिंदी कविता में अस्मिता की खोज और प्रतिरोध के स्वर
  12. समकालीन हिंदी कविता में आधुनिकता बोध और प्रतिरोध के स्वर
  13. सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' के उपन्यासों में चित्रित यथार्थवाद का समाजशास्त्रीय अध्ययन
  14. स्त्री विमर्श के परिप्रेक्ष्य में फणीश्वर नाथ 'रेणु' की रचनाओं का आलोचनात्मक मूल्यांकन
  15. हिंदी पत्रकारिता में यथार्थवाद और भाषा की बदलती प्रवृत्ति
  16. हिंदी पत्रकारिता में विस्थापन और त्रास और भाषा की बदलती प्रवृत्ति

लोक साहित्य और क्षेत्रीय संस्कृति

  1. आधुनिक हिंदी नाटकों में मानवीय संवेदना और रंगमंच की भूमिका
  2. कबीर के उपन्यासों में चित्रित प्रकृति चित्रण का समाजशास्त्रीय अध्ययन
  3. नागार्जुन के काव्य में यथार्थवाद का स्वरूप और उसकी प्रासंगिकता
  4. नागार्जुन के काव्य में सांस्कृतिक ह्रास और पुनरुत्थान का स्वरूप और उसकी प्रासंगिकता
  5. प्रेमचंदोत्तर हिंदी कहानी में सांस्कृतिक ह्रास और पुनरुत्थान और उसका यथार्थवादी चित्रण
  6. भक्तिकाल के साहित्य में प्रकृति चित्रण और मानवीय मूल्य
  7. मन्नू भंडारी के काव्य में आधुनिकता बोध का स्वरूप और उसकी प्रासंगिकता
  8. सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' के उपन्यासों में चित्रित राष्ट्रीय चेतना का समाजशास्त्रीय अध्ययन

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